Tuesday, 22 November 2016

घनाक्षरी (कवित्त) छन्द
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मातु शारदे हो विद्या - वाणी की सुदेवी तुम कवियों की वाणी में विलास करती हो माँ,
ज्ञानी- ध्यानी- ऋषि व मनीषी भजते हैं तुम्हें इनके हृदय में प्रकाश करती हो माँ।
हम सब नित्य वन्दना हैं करते  तुम्हारी जिनके जीवन का विकास करती हो माँ,
भारत में आज अज्ञान का अँधेरा छाया बोलो शारदे कहाँ प्रवास करती हो माँ।।




 अपने लहू से हिन्दबाग़ को जो सींच गए ऐसे देशभक्तों की जवानी को नमन है,
सबकुछ भूलकर मातृभूमि अस्मिता बचाने वाले वीरों की रवानी को नमन है।
गोरे आततायियों की यातनाओं का ज़वाब पुण्य वीरता की हर कहानी को नमन है,
शेखर भगत बिस्मिल राजगुरु जैसे एक - एक वीर बलिदानी को नमन है।।


देश की दशा को देखकर दिल रोता रहा इसीलिए आज मैंने लेखनी उठाई है,
माता भारती की दुर्दशा को देख - देखकर आज मेरी लेखनी की आँख भर आई है।
आज हिन्द में दिखाई देती चहुँओर भ्रष्टाचार - दुराचार वाली काली परछाई है,
जनता को रोटी - दाल ठीक से नसीब नहीं लुटेरों की थालियों में मक्खन - मलाई है।।


ढूँढ़ता हूँ पृथ्वीराज वाला वो अचूक तीर झाँसी की रानी की तलवार ढूँढ़ता हूँ मैं,
आत्मसम्मान ढूँढ़ता हूँ वो प्रताप वाला चन्द्रगुप्त मौर्य वाला वार ढूँढ़ता हूँ मैं।
शत्रुओं की नाक में नकेल कस डाले ऐसा शिवाजी का गुरिल्ला प्रहार ढूँढ़ता हूँ मैं,
जिसे देखकर शत्रुओं के होश उड़ते हों शेखर - भगत अवतार ढूँढ़ता हूँ मैं।।


चाणक्य की कूटनीति आज कहाँ खो गई है गुप्तकाल वाला अवशेष कहाँ खो गया,
वाल्मीकि - तुलसी के राम कहाँ खो गए हैं गीता वाला कृष्ण- उपदेश कहाँ खो गया।
नेताजी सुभाष वाली फ़ौज़ कहाँ खो गई है बलिदानियों का क्रान्तिवेश कहाँ खो गया,
त्याग- तप- दया- धर्म का जो पाठ पढ़ता था ऐसा अनुपम हिन्ददेश कहाँ खो गया।।


जाति- प्रांत- धर्म- भाषा की दीवार ढाहने को देश में समान हर नीति होनी चाहिए,
अनाचार- दुराचार- भ्रष्टाचार ख़ात्मे को संस्कारयुक्त हर रीति होनी चाहिए।
दूसरों को त्याग- दया- धर्म की हो सीख देना स्वयं की भी सदा इनमें प्रीति होनी चाहिए,
हिन्द की जो आन- बान- शान का हो प्रश्न वहाँ राजनीति नहीं राष्ट्रनीति होनी चाहिए।।

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