......उस हिन्द का वंदन करें.....
हम स्वार्थ से ऊपर उठें निज राष्ट्र का चिन्तन करें,
जो विश्वगुरु पद पर रहा उस हिन्द का वन्दन करें।
यह भूमि ऋषियों की रही तप-त्याग से सिंचित रही,
सम्पूर्ण वसुधा को कुटुम्ब बनाने को चिन्तित रही।
इसने दधीचि- सुकर्ण जैसे दानवीरों को दिया,
नानक- कबीर- रहीम- गौतम- जैन सा सुअमृत पिया।
अब राम- सीता- कृष्ण के आदर्श को पावन करें,
जो विश्वगुरु पद........
यह आर्यों की तपभूमि थी वेदों का पुण्य प्रकाश था,
"कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम् " का मन्त्र अपना ख़ास था।
जबतक यहाँ वेदों व वैदिक धर्म का प्राबल्य था,
तबतक यहाँ पाखण्ड- झूठ- अधर्म का दौर्बल्य था।
अब राष्ट्रभक्ति- सुस्वर में वेदों का पुनः अर्चन करें,
जो विश्वगुरु पद..........
यह शूरवीरों की धरा थी पुण्य कैसे वीर थे,
शेखर-भगत-बिस्मिल- सुभाष-प्रफुल्ल जैसे धीर थे।
स्वातंत्र्य यज्ञ में अनगिनत वीरों ने दी आहूतियाँ,
मंगल से लेकर बोस तक थीं उच्च पुण्य विभूतियाँ।
अशफ़ाक़ की उस आखिरी ख़्वाहिश का हम सुमिरन करें,
जो विश्वगुरु पद......
इस भारती की गोद में सुश्रुत- चरक से लाल थे,
भास्कर- वराह व आर्यभट्ट समान अतुलित भाल थे।
ऋषि दयानंद- विवेकानंद समान क्या कोई ज्ञान था,
साहित्य- संस्कृति- ज्ञान में इस हिन्द का सुस्थान था।
तुलसी से लेकर पंत- दिनकर- गुप्त का पूजन करें,
जो विश्वगुरु पद.........
अब सारे वाद- विवाद त्यजकर हिंदवादी मन्त्र लो,
अब "राष्ट्रदेवो भव" समान अचूक- पावन यंत्र लो।
आतंक- द्वेष- असत्य- भ्रष्टाचार का हो खात्मा,
कर्त्तव्य- त्याग व न्याय जन- जन की बने अब आत्मा।
माँ भारती के यज्ञ में सर्वस्व हम अर्पण करें,
जो विश्वगुरु पद.........
सत्येन्द सत्यार्थी ( अध्यापक व राष्ट्रवादी कवि )
दूरभाष - 9818266004
हम स्वार्थ से ऊपर उठें निज राष्ट्र का चिन्तन करें,
जो विश्वगुरु पद पर रहा उस हिन्द का वन्दन करें।
यह भूमि ऋषियों की रही तप-त्याग से सिंचित रही,
सम्पूर्ण वसुधा को कुटुम्ब बनाने को चिन्तित रही।
इसने दधीचि- सुकर्ण जैसे दानवीरों को दिया,
नानक- कबीर- रहीम- गौतम- जैन सा सुअमृत पिया।
अब राम- सीता- कृष्ण के आदर्श को पावन करें,
जो विश्वगुरु पद........
यह आर्यों की तपभूमि थी वेदों का पुण्य प्रकाश था,
"कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम् " का मन्त्र अपना ख़ास था।
जबतक यहाँ वेदों व वैदिक धर्म का प्राबल्य था,
तबतक यहाँ पाखण्ड- झूठ- अधर्म का दौर्बल्य था।
अब राष्ट्रभक्ति- सुस्वर में वेदों का पुनः अर्चन करें,
जो विश्वगुरु पद..........
यह शूरवीरों की धरा थी पुण्य कैसे वीर थे,
शेखर-भगत-बिस्मिल- सुभाष-प्रफुल्ल जैसे धीर थे।
स्वातंत्र्य यज्ञ में अनगिनत वीरों ने दी आहूतियाँ,
मंगल से लेकर बोस तक थीं उच्च पुण्य विभूतियाँ।
अशफ़ाक़ की उस आखिरी ख़्वाहिश का हम सुमिरन करें,
जो विश्वगुरु पद......
इस भारती की गोद में सुश्रुत- चरक से लाल थे,
भास्कर- वराह व आर्यभट्ट समान अतुलित भाल थे।
ऋषि दयानंद- विवेकानंद समान क्या कोई ज्ञान था,
साहित्य- संस्कृति- ज्ञान में इस हिन्द का सुस्थान था।
तुलसी से लेकर पंत- दिनकर- गुप्त का पूजन करें,
जो विश्वगुरु पद.........
अब सारे वाद- विवाद त्यजकर हिंदवादी मन्त्र लो,
अब "राष्ट्रदेवो भव" समान अचूक- पावन यंत्र लो।
आतंक- द्वेष- असत्य- भ्रष्टाचार का हो खात्मा,
कर्त्तव्य- त्याग व न्याय जन- जन की बने अब आत्मा।
माँ भारती के यज्ञ में सर्वस्व हम अर्पण करें,
जो विश्वगुरु पद.........
सत्येन्द सत्यार्थी ( अध्यापक व राष्ट्रवादी कवि )
दूरभाष - 9818266004